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Posts Tagged ‘Mirza Ghalib’

With all due respect for Ghalib Mirza Asadullah Khan, here is my take on clinging to the faintest hope in life, and moving on…

दिल ही तो है, ना नज्म-ए-गालिब, उम्मिद से भर ना आए क्यू …
हस देन्गे कल खूद पर हजार बार, आज गुदगूदा के मूस्कूराए ना क्यू…

उम्मिद-ए-सूबह के बगैर, कौनसी रात पूरी है?
सर उठा के हम अंधेरे मे सितारो के पार नजर गङाए ना क्यू…
दिल ही तो है, ना नज्म-ए-गालिब, उम्मिद से भर ना आए क्यू …

चाहत नही, नफरत नही, गूनाह नही, माफी नही,
उम्मिद से भरा यह आज है, कल की हमे हो सोच क्यू…
दिल ही तो है, ना नज्म-ए-गालिब, उम्मिद से भर ना आए क्यू …

अपनाए, ठूकराए, बक्शे जिन्दगी, बन्दे का कभी रहा है जोर कहा?
बस है हमारा, दम है हमारा, हमारी उम्मिद पर फिर हो आन्च क्यू…
दिल ही तो है, ना नज्म-ए-गालिब, उम्मिद से भर ना आए क्यू…

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